तू जिनपे जाँ लुटाता है बताता है कि तेरे हैं
ये सब आराम के साथी हैं तेरे हैं न मेरे हैं
मुझे देखो तो देखो बस मेरी आँखों में मत देखो
इन्हीं आँखों में कुछ बेघर सितारों के बसेरे हैं
निकल आओ कि अब महबूब की ज़ुल्फ़ों से ऐ लोगों
इसी दुनिया में देखो और भी क़ातिल अंधेरे हैं
मेरी क़िस्मत में हैं बेबस सी कुछ बेज़ान सी रातें
तुम्हारी ज़िंदगी रौशन तुम्हारे ही सवेरे हैं
मुझे लगता है ये दुनिया इन्हें भी मार ही देगी
कई किरदार जो आँखों में अब मैं ने उकेरे हैं
नहीं अब और तो कुछ भी नहीं दरकार है मुझ को
मुझे चारों तरफ़ से ज़िंदगी के फेर घेरे हैं
बता तो क्यूँ भला तुझ को मैं अपने दिल में घर दे दूँ
मिरा दिल जंग का मैदान है घावों के डेरे हैं















