पहले याद आती हैं तो रोती हैं आँखें फिर कहीं जा कर ज़रा सोती हैं आँखेंहर नज़र में क़ैद हैं मंज़र कई सेख़्वाबों की लाशें फ़क़त ढोती हैं आँखें— Nakul kumar