Nakul kumar

Nakul kumar

@nakulra821041

Nakul kumar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Nakul kumar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher(15)
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Sher

लोग तो बस जिस्मों पर बनवाते फिरते हैं लेकिन तेरे नाम का टैटू मैं ने दिल पर बनवाया था — Nakul kumar
मेरे हर ग़म में वो इज़ाफ़ा दानिस्ता करती है और ये काम भी वो आहिस्ता-आहिस्ता करती है — Nakul kumar
मैं चाहता हूँ कि आँसू लूँ कुछ निकाल तिरे तिरी नज़र में छुपे हैं सभी सवाल तिरे — Nakul kumar
तू चाहिए कि मुकम्मल ही चाहिए मुझ को तिरा ये जिस्म भी मेरा हो और तेरा दिल भी — Nakul kumar
इक लड़की जो मेरी दुनिया थी और वो भी दुनिया जैसी निकली — Nakul kumar
इक शहज़ादी ने दी है इक माँ को उतरन इक बच्ची को मिल जाएँगे नए कपड़े आज — Nakul kumar
इस क़दर दिल सहे ज़द ठीक नहीं इश्क़ की इतनी भी हद ठीक नहीं बंद कमरे से निकल आ बाहर दर्द की इतनी मदद ठीक नहीं — Nakul kumar
इस मोहब्बत में मेरी कुछ ऐसे बर्बादी हुई है उस की मेरी ही नज़र के सामने शादी हुई है — Nakul kumar

Ghazal

पीते रहें ज़हरीले रिश्तों की शराब अब और न दीजे झूटे वादों की शराब है मय-कदा घर के बहुत नज़दीक में है मय-कदे में सारे ज़ख़्मों की शराब मेरे गले से ये उतरती ही नहीं कड़वी बहुत है तेरी यादों की शराब कुछ यूँँ शब-ए-ग़म को किया था मुख़्तसर कल रात हमनें पी सितारों की शराब यारों तुम्हारे जाम पानी हो गए मुझ को पिलाओ उस के हाथों की शराब हम को दिया है शा'इरी ने ये नशा हम रोज़ पीते है किताबों की शराब अब ये गुलाब आँखों में चुभते हैं बहुत कोई बना दे इन गुलाबों की शराब दिन में कहीं मर जाती है ये ज़िंदगी ज़िन्दा हमें रखती है रातों की शराब — Nakul kumar
वो मिला है हम को सफ़र यहाँ जो मेरा नहीं जो तेरा नहीं है ये रास्ता कोई बद-ग़ुमाँ जो मेरा नहीं जो तेरा नहीं जो मोहब्बतों में नहीं रहे हैं जो नफ़रतों में शुमार हैं बना है उन्हीं का ही कारवाँ जो मेरा नहीं जो तेरा नहीं जहाँ चाँदनी में है तीरगी जहाँ सुब्ह से न हो रौशनी रहे हम उसी सर-ए-आसमाँ जो मेरा नहीं जो तेरा नहीं किसी बात पर न मलाल है न ही दिल में कोई सवाल है तो ये दर्द कैसा है दरमियाँ जो मेरा नहीं जो तेरा नहीं ये उदासियाँ सभी शाम की ये जो मुश्किलें हैं तमाम सी दे रहे हैं हम कोई इम्तिहाँ जो मेरा नहीं जो तेरा नहीं — Nakul kumar
यहाँ किसी भी नज़र में वो बात थी ही नहीं तुम्हारे बा'द किसी से नज़र मिली ही नहीं जुदा हुए तो भी एहसास तक हमें न हुआ कभी भी तर्क-ए-त'अल्लुक़ की बात की ही नहीं न साथ थे न जुदा थे अजीब हाल रहें मोहब्बतों में हमें क़ुर्बतें मिली ही नहीं तेरे ग़मों ने दिए हैं मुझे नए मा'नी कि ज़िंदगी में मेरी अब कोई कमी ही नहीं भरा हुआ है फ़क़त ज़हर से मेरा साग़र ये तिश्नगी भी है ऐसी कि मानती ही नहीं तुम्हारे साथ ही देखा था मुस्कराते हुए तुम्हारे बा'द तो ये ज़िन्दगी हँसी ही नहीं ख़मोशियों ने ग़लतफ़हमियाँ बढ़ाई थीं वो गुफ़्तगू भी हुई जो कभी हुई ही नहीं बिछड़ के तुम सेे हुई मुल्तवी उदासी मेरी तुम्हारी टीस तो मुझ में कभी टिकी ही नहीं — Nakul kumar

Nazm