सोचते हो कि हार जाऊँगा
तुम को सूरज नया दिखाऊँगा
शौक़ से और मुझे सताओ तुम
मैं ज़रा और मुस्कराउँगा
तुम ने मिट्टी बना दिया मुझ को
ख़ुद को मैं इक दिया बनाऊँगा
इश्क़ ने कर दिया मुझे नाकाम
शायद अब अपने काम आऊँगा
अब भरोसा नहीं मुझे किसी पर
अपनी कश्ती मैं ख़ुद बनाऊँगा
याद रखना है तुझ को ज़िंदगी भर
तेरी तस्वीर नइँ हटाऊँगा
शब-ए-फ़ुर्क़त आ मिल के जश्न करें
तुझ को शब भर ग़ज़ल सुनाऊँगा
— Nakul kumar















