किस ने लूटा मुझे दिल रहा ही नहीं

यूँ चुरा ले गया जैसे था ही नहीं

वो अब आया है अपनी ख़ता के लिए
जब मेरे पास उस की सज़ा ही नहीं

सुब्ह तक नामवर हो गए हम मगर
रात वो शख़्स हम से मिला ही नहीं

ढूँडता था जिसे हर घड़ी हर जगह
वो मिला तो मुझे जानता ही नहीं

वक़्त भी है ये बे-रहम उस की तरह
वक़्त ने ज़ख़्म कोई भरा ही नहीं

साल हर साल जैसा नया आ गया
ज़िंदगी में मगर कुछ नया ही नहीं

रात भर थी परेशाँ यहाँ की हवा
रात भर इक दिया था बुझा ही नहीं

आप क्यूँ है परेशाँ दियों के लिए
आप के शहर में वो हवा ही नहीं

— Nakul kumar

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