ये क्या है जो टलता नहीं है
मेरा दिल बहलता नहीं है
जहाँ चाहता हूँ मैं चलना
वहाँ कोई चलता नहीं है
इन आँखों में पत्थर अड़ा है
कोई ग़म निकलता नहीं है
मुझे देखना पड़ता है वो
जो मंज़र बदलता नहीं है
मैं ख़ुद को कहाँ तक बदल लूँ
वो क्यूँ मुझ में ढलता नहीं है
हवा ने की कोशिश बहुत पर
चराग़ इक दहलता नहीं है
— Nakul kumar















