अजब सुरूर सी चढ़ी वो आशिक़ी नई नई
हमें लगा कि हो गई ये ज़िंदगी नई नई
नई नई लगी हवा नए लगे दयार सब
नशा नया हुआ हमें थी बे-ख़ुदी नई नई
तमाम ग़म जहान के मेरे जिगर में आ बसे
यूँ मेरे दिल को मिल गई कुशादगी नई नई
ये दिल की धड़कनों का भी मुआमला अजीब है
कभी लगी हैं आख़िरी कभी कभी नई नई
— Nakul kumar















