कभी उतरा था आसमाँ मुझ में

खो गया जाने फिर कहाँ मुझ में

जो कभी अपने घर नहीं लौटा
है उसी शख़्स का मकाँ मुझ में

मुझ को ज़िंदा कोई नहीं मिलता
रोज़-ओ-शब उठता है धुआँ मुझ में

सब ने देखा है मुझ में इक तालाब
कोई दरिया भी है रवाँ मुझ मैं

आज वो क़ीमती है इस जहाँ में
हो गया था जो राएगाँ मुझ में

ज़िंदगी काट दूँगा तन्हा मैं
इस गुमाँ का भी है गुमाँ मुझ में

मुझ से गुज़री थी इक बहार कभी
ठहरी है अब तलक ख़िज़ाँ मुझ में

आप की याद है बसी दिल में
रोज़ आती हैं तितलियाँ मुझ में

चीख़ता है कोई मेरे अंदर
या'नी अब मैं ही हूँ निहाँ मुझ में

— Nakul kumar

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