रंजिशें सब छोड़ दीं सब सेे लड़ाई छोड़ दी
ऐब था सच बोलना मैं ने बुराई छोड़ दी
कू-ए-जानाँ में भला अब देखने को क्या बचा
सुन रहा हूँ आपने भी बे-वफ़ाई छोड़ दी
ज़ेहन में उभरे थे यूँ ही बे-वफ़ा यारों के नाम
लिखते लिखते क्यूँ क़लम ने रौशनाई छोड़ दी
हम से पूछो किस लिए ख़ाली ख़ज़ाने हो गए
शाहज़ादों ने फ़क़ीरों की गदाई छोड़ दी
— Nashir Naqvi















