शोर मत करना अभी मेरी ग़ज़ल के पीछेहसरतें सोई हैं इस ताज-महल के पीछेग़ौर करता हूँ तो कुछ ज़ाइक़ा बढ़ जाता हैआँधियाँ झेली हैं पेड़ों ने भी फल के पीछेबस यही सोच के मैं अपने उठाता हूँ क़दमरूह चलती है बुज़ुर्गों की अमल के पीछे— Nashir Naqvi