jab zaraa tez hawa hoti hai | जब ज़रा तेज़ हवा होती है

  - Nasir Kazmi

जब ज़रा तेज़ हवा होती है
कैसी सुनसान फ़ज़ा होती है

हम ने देखे हैं वो सन्नाटे भी
जब हर इक साँस सदा होती है

दिल का ये हाल हुआ तेरे बाद
जैसे वीरान सरा होती है

रोना आता है हमें भी लेकिन
इस में तौहीन-ए-वफ़ा होती है

मुँह-अँधेरे कभी उठ कर देखो
क्या तर ओ ताज़ा हवा होती है

अजनबी ध्यान की हर मौज के साथ
किस क़दर तेज़ हवा होती है

ग़म के बे-नूर गुज़रगाहों में
इक किरन ज़ौक़-फ़ज़ा होती है

ग़म-गुसार-ए-सफ़र-ए-राह-ए-वफ़ा
मिज़ा-ए-आबला-पा होती है

गुलशन-ए-फ़िक्र की मुँह-बंद कली
शब-ए-महताब में वा होती है

जब निकलती है निगार-ए-शब-ए-गुल
मुँह पे शबनम की रिदा होती है

हादसा है कि ख़िज़ाँ से पहले
बू-ए-गुल गुल से जुदा होती है

इक नया दौर जनम लेता है
एक तहज़ीब फ़ना होती है

जब कोई ग़म नहीं होता 'नासिर'
बेकली दिल की सिवा होती है

  - Nasir Kazmi

Dard Shayari

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