हम ने देखी गुलाब सी सूरत
कैसी कैसी गुलाब सी सूरत
इक नज़र देख ही नहीं पाए
याद आई गुलाब सी सूरत
पूछते हो की ज़िंदगी क्या हैं
मुस्कुराती गुलाब सी सूरत
तंग रहता हैं जब से आईना
क्यूँ सजी थी गुलाब सी सूरत
हम ने फिर से हथेली फैलाई
जब भी बिखरी गुलाब सी सूरत
अब भी मासूमियत पे मरते हो
हैं तबाही गुलाब सी सूरत
— Nikunj Rana















