जान लुटा चाहत पर हम ने
लिक्खा है ये ख़त पर हम ने
इश्क़ नहीं करते, भूल हुई
सोचा नइँ सरवत पर हम ने
बस तुम से बातें करनी थीं
रात बिता दी छत पर हम ने
जो ग़ज़लें यार कहीं अब तक
सारी इक निस्बत पर हम ने
शाइ'र बनना ठीक लगा पर
मय नइँ पी फ़ुर्कत पर हम ने
आप हमें मिल जाएँ, अब ये
छोड़ दिया क़िस्मत पर हम ने
— Nirvesh Navodayan















