आबरू तो आबरू है आबरू पर क्या लिखूँ
ये मुक़द्दस है ख़ुदा सी हू-ब-हू पर क्या लिखूँ
दोस्त उल्फ़त चीज़ ही ऐसी बनी है बा-गज़ब
हर कोई माइल है फिर इस आरज़ू पर क्या लिखूँ
जो अकेलेपन में ख़ुदस करता रहता हूँ मैं ख़ुद
ज़ह्र सी तन्हाई की उस गुफ़्तगू पर क्या लिखूँ
मेरे इन अल्फ़ाज़ की सीरत है चुप रहते नहीं
और मैं ख़ामोशियों की जुस्तुजू पर क्या लिखूँ
रूठकर बैठी है मुझ से ये सुख़न-गोई मेरी
इस क़दर मैं 'नित्य' सूरत सुर्ख़-रू पर क्या लिखूँ
— Nityanand Vajpayee















