मेरी हिम्मत के आगे ज़ुल्मों की औक़ात ही क्या है
मैं झुक जाऊँ बिना टूटे अगर फिर बात ही क्या है
समुंदर हम तेरी क़ुव्वत से डर जाएँ भी क्यूँ आख़िर
हमारी प्यास के आगे तुम्हारा गात ही क्या है
तुम्हारी फ़ौजों की तादाद हम को क्या बताते हो
कि सूरज को अँधेरी रात की इफ़रात ही क्या है
— Nityanand Vajpayee















