पल दो पल जी लेते हैं
यादों के गहरे दरिया में
हम हर दिन डुबकी लेते हैं
ख़्वाबों में तुम मिल जाते हो
फिर पल दो पल जी लेते हैं
इश्क़ अधूरा अपना है जो
मुमकिन है पूरा कब होना
हम दोनों ने ख़्वाब बुने जो
फ़ितरत है उन की बस रोना
दर्द दवा अपनी है केवल
उस को ही अब पी लेते हैं
सावन आया प्यारा सब को
हम दोनों के तन मन बहके
सबकी आज मिलन की बेला
बूँद हमें शोलों सी दहके
अंबर भी रोते रह-रह कर
जब जब हम सिसकी लेते हैं
बेगानों में कौन सुनेगा
किस को जा कर दर्द सुनाएँ
ज़हर ज़ुदाई का पीना है
गीत विरह के आओ गाएँ
बाग़ों में चातक के सुर पर
रागों की मुरकी लेते हैं
— Nityanand Vajpayee















