मज़म्मत है मज़म्मत है मज़म्मत है मज़म्मत है
फ़क़त मुझको ही क्यूँ इस दुनियाभर को तुझ सेे दिक़्क़त है
वो दहशत-गर्द थे या कायरों का झुंड था कोई
निहत्थों और मासूमों पे गोली कैसी वहशत है
ये किस मज़हब की सिखलाई है किस अल्लाह का पैग़ाम
अगर ऐसा नहीं है फिर बहुत गंदी हिमाक़त है
अगर तुम जंग-जू होते तो करते आ के दो-दो हाथ
मगर तुम कायरों में कब भला होनी ये हिम्मत है
मुजाहिद कहते हो ख़ुद को है मतलब भी तुम्हें मालूम
अगर ऐसे मुजाहिद हो तो फिर तो तुम पे लानत है
यूँँ बेबस और मज़लूमों निहत्थों पर तुम्हारा वार
सुबूत इस बात का है तुम में कुफ़्रों की अलामत है
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