एक सपना
एक सपना है मेरा
कि कभी ऐसे मिलूँ तुम से
जहाँ वक़्त की कोई सीमा न हो
जहाँ जाने की कोई ज़िद न हो
बेहद ख़ूब-सूरत रात किसी समुंदर के किनारे
जब मैं कभी तारों को देखूँ
तो कभी तुम्हें
कि जब फ़िज़ा की ख़ूबसूरती भी
तुम्हारी उस काली बिंदी
और सफ़ेद झुमके के आगे
मुझे फीकी लगने लगे
तुम कहो मुझ से
कि सुनो
कोई गीत मुझे सुनाओ ना
फिर कर के कोई इशारा तुम
मुझे पास अपने बुलाओ ना
तब मैं वो गीत सुनाऊँ
जो तुम्हें बेहद पसंद है
हाँ हाँ वही हमारा गीत
गाते-गाते मैं कहूँ तुम से
कि सुनो
साथ मेरे तुम भी गुनगुनाओ ना
देख कर एक ऐसी मुहब्बत
बन जाएँ समुंदर की लहरें जैसे कोई साज़
था
में रखूँ मैं तुम्हारा हाथ और तुम मुझे
मुस्कुराके देखती रहो
गुनगुनाती रहो
और फिर बिन कहे लिपट जाओ
तुम मुझ से इस क़दर
कि वो नज़दीकी कोई मिटा न सके
तुम ख़ुद भी नहीं















