“वो”

वो परी थी मेरे जीवन की
वो रौशनी थी मेरे चेहरे की
वो ख़्वाब थी मेरी रातों की
वो सुकून थी मेरी सुब्हों की

वो इंतिज़ार थी मेरी आँखों की
वो बहार थी मेरे आँगन की
वो आवाज़ थी कई गीतों की
वो पुकार थी मेरे होंठों की

वो मंज़िल थी मेरी राहों की
वो आरज़ू थी मेरी बाँहों की
वो रोज़ का विसाल थी
वो ता-उम्र का ख़याल थी

मगर कहीं अब खो गई वो
दूर मुझ से अब हो गई वो
कितना मनाया कितना बुलाया
ग़ैर मगर फिर हो गई वो

दिन-रात अब यही सोचता हूँ
बहुत सी बातें कहनी थी
बहुत सी बातें सुननी थी
ख़ैर मिल जाए वो कहीं तुम्हें तो
बस कह देना “जन्मदिन मुबारक”

— Prakash Pandey

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