कोई समझता ही नहीं हाल-ए-दिल क्या करें

शहर का शहर हैं यहाँ क़ातिल क्या करें

सफ़र-ए-ज़िन्दगी गुज़र गई एक सफ़र में
अब मिल भी जाए तो मंज़िल क्या करें

दोस्ती की मुहब्बत की सुकूँ से जीने के लिए
सुकून फिर भी न मिले तो आदमीं क्या करे

एक पल भी मुझे जीने लाइक़ तो मिले
जीने लायक़ ही नहीं तो ज़िन्दगी क्या करे

मेरे दोस्त दोस्ती के बदलें में दोस्ती न कर
जब तक दिल न मिलें कोई दोस्ती क्या करे

तू कहें तो जीना छोड़ दे उठ जाए मौत से
तू ही बता तेरे ख़ातिर हम और क्या करे

— Praveen Bhardwaj

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