mujhe ab to kisi se bhi muhabbat ho nahin sakti | मुझे अब तो किसी से भी मुहब्बत हो नहीं सकती

  - Praveen Bhardwaj

मुझे अब तो किसी से भी मुहब्बत हो नहीं सकती
किसी दिल पर अब और ज़्यादा अज़िय्यत हो नहीं सकती

तुम्हें जाना हैं जाओ तुम बताओ या न तुम पूछो
दिल-ए-बीमार से इसकी इजाज़त हो नहीं सकती

तुम्हारे दिल को जितने में तस्सली हो मुझे गम दो
मुझे फिर भी कभी तुम सेे शिकायत हो नहीं सकती

उसी का हाथ है जिसने दिया था ज़ख़्म ये वाला
किसी के हाथ में उतनी नज़ाकत हो नहीं सकती

मुझे मेरी मुहब्बत का जो चाहे वो सज़ा दे दो
गुनाह ऐसी करे कोई रियायत हो नहीं सकती

मुझे अपनी ज़रूरत से करो तुम याद जब चाहो
मगर हम सेे कभी ऐसी हिमाक़त हो नहीं सकती

जो ग़म हमको दिया तुमने वो ही ग़म तुमको हम दे दें
किसी भी हाल हम सेे ये तिजारत हो नहीं सकती

  - Praveen Bhardwaj

Zakhm Shayari

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