मुझे अब तो किसी से भी मुहब्बत हो नहीं सकती
किसी दिल पर अब और ज़्यादा अज़िय्यत हो नहीं सकती
तुम्हें जाना हैं जाओ तुम बताओ या न तुम पूछो
दिल-ए-बीमार से इस की इजाज़त हो नहीं सकती
तुम्हारे दिल को जितने में तस्सली हो मुझे ग़म दो
मुझे फिर भी कभी तुम से शिकायत हो नहीं सकती
उसी का हाथ है जिस ने दिया था ज़ख़्म ये वाला
किसी के हाथ में उतनी नज़ाकत हो नहीं सकती
मुझे मेरी मुहब्बत का जो चाहे वो सज़ा दे दो
गुनाह ऐसी करे कोई रियायत हो नहीं सकती
मुझे अपनी ज़रूरत से करो तुम याद जब चाहो
मगर हम से कभी ऐसी हिमाक़त हो नहीं सकती
जो ग़म हम को दिया तुम ने वो ही ग़म तुम को हम दे दें
किसी भी हाल हम से ये तिजारत हो नहीं सकती















