फूल देखे न तितलियाँ देखीं
जल रही मैंने बस्तियाँ देखीं
तीर आँखों में मारता कैसे
आँख नइँ मैंने मछलियाँ देखीं
हुस्न पे जिस के मरती थी दुनिया
उस के कानों की बालियाँ देखीं
देख जो सकता नइँ था ज़ख़्म-ए-दिल
सिर्फ़ उसने ही सिसकियाँ देखीं
इन दरख़्तों के पैर छूटे हैं
'उम्र भर जिसने आँधियाँ देखीं
देखने को जो कुछ बचा नइँ तो
ख़ुद में दो-चार ख़ामियाँ देखीं
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