फूल देखे न तितलियाँ देखीं
जल रही मैं ने बस्तियाँ देखीं
तीर आँखों में मारता कैसे
आँख नइँ मैं ने मछलियाँ देखीं
हुस्न पे जिस के मरती थी दुनिया
उस के कानों की बालियाँ देखीं
देख जो सकता नइँ था ज़ख़्म-ए-दिल
सिर्फ़ उस ने ही सिसकियाँ देखीं
इन दरख़्तों के पैर छूटे हैं
उम्र भर जिस ने आँधियाँ देखीं
देखने को जो कुछ बचा नइँ तो
ख़ुद में दो-चार ख़ामियाँ देखीं
— Praveen Bhardwaj















