सबकी अपनी-अपनी मर्ज़ी होती हैंजो यहाँ से अब जैसा चाहें वैसा चुनेउस की मर्ज़ी हैं पत्थर को फूल समझेया फिर अपने फूल से बस काँटा चुने— Praveen Bhardwaj