जितने मौसम भी अभी तक के सुहाने आए
सब के सब ही तो मिरे दिल को दुखाने आए
जीते जी दे न सके रोने पे काँधा अपना
वक़्त-ए-रुख़्सत पे वही लोग उठाने आए
मैं खिलौना लिए बैठा रहा उम्मीद में पर
फिर कहाँ लौट के बचपन के ज़माने आए
जो कभी जुस्तजू-ए-रौशनी में थे यकसर
क्यों वही लोग चराग़ों को बुझाने आए
मैं तिरा दर्द मिरा दर्द समझ कर रो लूँ
पर कभी तू भी मिरे दर्द मिटाने आए
आज़माते हुए जब उम्र गुज़ारी जा चुकी
तब कहीं जा के मिरे होश ठिकाने आए
अपने क़ातिल से गुज़ारिश है मिरी बस इतनी
कि वही ख़ुद मेरी तुर्बत भी सजाने आए
एक मुद्दत है हुई तर्क-ए-मुहब्बत को मगर
याद आई तो कई दर्द पुराने आए
— Pravendra Anuragi















