महज़ तस्वीर थी इक वो भी जला दी हम ने
एक दुनिया थी मुहब्बत की मिटा दी हम ने
मार डाला हमीं ने इश्क़ के परवाने को
और उम्मीद की हर शम्अ बुझा दी हम ने
धड़कनें इस की घुटन से कहीं दम तोड़ न दें
दिल की हर सम्त जो दीवार उठा दी हम ने
उठ गया अपनी फ़क़ीरी का जनाज़ा साहिब
आग सहरा-ए-मुहब्बत में लगा दी हम ने
अपने पुरखों की ज़मीं बेच के ये सोचते हैं
एक मज़बूत इमारत थी जो ढा दी हम ने
— Pravendra Anuragi















