राह-ए-उल्फ़त पे पैरों को जलना था

मुझ को पता था फिर भी मुझ को चलना था

आग में थोड़ा कम ही मुझ को जलना था
शायद मुझ को अपना ख़्वाब बदलना था

हिजरत का तो कोई सबब मत पूछो अब
मुझ को आख़िर मेरे रस्ते चलना था

सूख गए थे मेरी आँखों के आँसू
उस पर भी मुझ को सहरा में चलना था

तेरे बिन दुनिया घूमे तो क्या मतलब
शब भर मुझ को तेरे साथ टहलना था

तेरी ख़ातिर फूलों पे चल के देखा
मुझ को शायद अंगारों पे चलना था

— Pravendra Anuragi

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