उम्र भर को बस यही इक इम्तिहाँ बाक़ी रहा
इक अजब रिश्ता हमारे दरमियाँ बाक़ी रहा
वो इमारत जो बहुत ऊँची थी इक दिन ढह गई
कुछ नहीं बाक़ी रहा बस ख़ाक-दाँ बाक़ी रहा
हाथ मेरे छू नहीं पाए कभी उस को मगर
रूह पे मेरी मुहब्बत का निशाँ बाक़ी रहा
बद्दुआ में आग थी और आग में ताक़त बहुत
जल गया सब कुछ न कोई भी निशाँ बाक़ी रहा
मंजिलें गुम हैं कहीं और हम-सफ़र भी खो गए
रास्तों को कोसना भी अब कहाँ बाक़ी रहा
कुछ सुनहरे ख़्वाब आ कर बोलते हैं कान में
किस तरह से कुछ उमीदों को मकाँ बाक़ी रहा
बे-रुखी तुम से अभी आसान है मुझ को बहुत
अब न कोई भी वफ़ा का आशियाँ बाक़ी रहा
— Pravendra Anuragi















