यही कहूँगा उम्र भर सभी जवाब टाल कर
कभी तो मिल लिया करो ज़रा समय निकाल कर
उजड़ गईं जो बस्तियाँ उन्हीं का कुछ ख़याल कर
मिला ही क्या है यूँ किसी की ज़िंदगी मुहाल कर
बरस रही है आग अब मुहब्बतों के शहर में
क़दम क़दम बढ़ाए जा ज़रा सा देखभाल कर
सिमट रही है आशिक़ी तो जिस्म की तलाश तक
नहीं बचे हैं आशिक़ अब जो रक्खें दिल निकाल कर
नज़र चुरा रहा हूँ मैं हर एक आइने से अब
निकल चुका हूँ आगे जो सभी को भूल भाल कर
अब और कितनी होनी होगी अंजुमन में ख़ामुशी
जो बढ़ रही है ज़िंदगी मुझे बहुत निढाल कर
— Pravendra Anuragi















