ये साँस भरती हुई ज़िंदगी का दुख है मुझे
तुम्हारा इस का और उस का सभी का दुख है मुझे
सिमट गईं किसी जंगल की वहशतें मुझ में
सो घर में होते हुए बे-घरी का दुख है मुझे
बहुत ज़ियादा अँधेरों से भी शिकायत थी
और इन दिनों तो बहुत रौशनी का दुख है मुझे
मैं रो पड़ूँगा बहुत भींच के गले न लगा
मैं पहले जैसा नहीं हूँ किसी का दुख है मुझे
ये कोई शे'र नहीं हैं ये ज़ख़्म हैं मेरे
तबीब बोलता है शा'इरी का दुख है मुझे
बिछड़ के तुझ से मैं इंसानियत से गिर गया हूँ
तू ख़ुश हुआ है तो तेरी ख़ुशी का दुख है मुझे
— Qamar Abbas Qamar















