हम को फँसा गया है वो इतने कमाल से
अब तक निकल सके न मोहब्बत के जाल से
दो-चार दिन के प्यार में जो ग़म मिले हमें
हम ले के फिर रहे हैं उन्हें आठ साल से
दिलदार ने अता किए कुछ इस तरह के दुख
जो ख़त्म होंगे सिर्फ़ मेरे इंतिक़ाल से
कैसे न धोखा खाए कोई उन से दोस्तो
जब बे-वफ़ा वो लगते नहीं चाल ढाल से
इक मुँदरी से तो कुछ नहीं होगा तुम्हारा 'राज़'
चूड़ा बना के लाइए घोड़े की नाल से
— Raaz Gurjar















