छेनी नहीं चलाता उन पर सज़ा की ख़ातिर
पत्थर तराशता हूँ मैं तो कला की ख़ातिर
उस दिन ख़ुदा भी अपने आँसू बहाएगा फिर
मर जाएँगे सभी जब अपने ख़ुदा की ख़ातिर
बाद-ए-सबा भी उनके दिल को खिला न पाई
बैठे थे जो छतों पर ताज़ा हवा की ख़ातिर
घर में पड़ा हुआ था आराम से मगर मैं
बाहर निकल के आया उस की सदा की ख़ातिर
मिलते नहीं हैं अब तो इंसान वो कहीं पर
देते थे जान अपनी वो जो वफ़ा की ख़ातिर
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