chheni nahin chalaata un par saza ki khaatir | छेनी नहीं चलाता उन पर सज़ा की ख़ातिर

  - Rachit Sonkar

छेनी नहीं चलाता उन पर सज़ा की ख़ातिर
पत्थर तराशता हूँ मैं तो कला की ख़ातिर

उस दिन ख़ुदा भी अपने आँसू बहाएगा फिर
मर जाएँगे सभी जब अपने ख़ुदा की ख़ातिर

बाद-ए-सबा भी उनके दिल को खिला न पाई
बैठे थे जो छतों पर ताज़ा हवा की ख़ातिर

घर में पड़ा हुआ था आराम से मगर मैं
बाहर निकल के आया उसकी सदा की ख़ातिर

मिलते नहीं हैं अब तो इन्सान वो कहीं पर
देते थे जान अपनी वो जो वफ़ा की ख़ातिर

  - Rachit Sonkar

Aadmi Shayari

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