ज़रा-ज़रा सा मैं मर रहा हूँ
तुम्हारे दिल से उतर रहा हूँ
क़सम तो खाई थी मैं ने फिर भी
मैं उस के दर से गुज़र रहा हूँ
कोई तो मुट्ठी में बाँधे मुझ को
कि रेत जैसा बिखर रहा हूँ
तुम्हीं हो ख़ुशबू तुम्हीं फ़ज़ा हो
मैं तुम से मिल कर निखर रहा हूँ
हमेशा सच ही कहाँ है मैं ने
इसी लिए मैं अखर रहा हूँ
मिली नहीं है नज़र अभी तक
मैं तुम से मिलने को मर रहा हूँ
— Rachit Sonkar















