मेरी जाँ भूलना भी इक हुनर की बात हो जैसे

मैं तुझ से प्यार का इज़हार करना भूल जाता हूँ
तुझे लगता है मैं तेरे लिए इक फूल ना लाया
बड़ा कमज़र्फ आशिक़ है, कभी ये बोल ना पाया
मेरी जाँ ये तुम्हारे हक़ में है,तुम सोच सकती हो
मेरी आँखों में आँखें डालकर तुम बोल सकती हो
मैं शाइ'र हूँ, मुझे तो और भी हैं काम दुनिया में
फ़क़त तेरी मुहब्बत को कहाँ तक याद रक्खूँगा
इन आँखों में कहाँ तक बस तुम्हारे ख़्वाब रक्खूँगा
मेरी आँखों के आगे और भी चेहरे उतरते हैं
मैं आँखें बंद भी कर लूँ तो ये चेहरे उभरते हैं
ग़रीबी, मौत के साए, लहू में पल रहे बच्चे
हवस की आग में लाखों-करोड़ों जल रहे बच्चे
जवानी जूझती है हर तरफ़ रोटी के फाकों में
बुढापा देखता है मौत अपनी रोज़ रातों में
मेरी जाँ ये भी मेरे हैं, इन्हें भी प्यार करता हूँ
सो मैं कैसे कहूँ कि बस तुझे ही प्यार करता हूँ

मेरी जाँ भूलना भी इक हुनर की बात हो जैसे
मैं तुझ से प्यार का इज़हार करना भूल जाता हूँ

— Raghav Ramkaran

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Ilm Shayari

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