पसीना पोटली में बस लिए लौटा है दिनभर की

यही तनख़्वाह है इस देश में मज़दूर नौकर की

भला फ़ौलाद बनकर भी जहाँ को किस ने जीता है
यहाँ चंगेज़ भी हारा मिटी हस्ती सिकंदर की

हथेली की लकीरें तुम से मंज़िल का पता पूछें
नई पहचान लिख हाथों से ख़ुद अपने मुक़द्दर की

न रख तलवार हाथों में क़लम की धार पैनी रख
मिटा देती है हस्ती शब्द की ताक़त सितमगर की

इबादतगाह तुम माँ-बाप के क़दमों में ही जानो
यहीं जन्नत है असली प्रीत बेज़ा खाक़ दर-दर की

— Ragini Preet

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