बचा के रक्खी थी कुछ रौशनी ज़माने से
हवा चराग़ उड़ा ले गई सिरहने से
नसीहतें ना करो इश्क़ करने वालों को
ये आग और भड़क जाएगी बुझाने से
बहकते रहने की आदत है मेरे क़दमों को
शराब-ख़ाने से निकलू की चाय-ख़ाने से
— Rahat Indori
हवा चराग़ उड़ा ले गई सिरहने से
नसीहतें ना करो इश्क़ करने वालों को
ये आग और भड़क जाएगी बुझाने से
बहकते रहने की आदत है मेरे क़दमों को
शराब-ख़ाने से निकलू की चाय-ख़ाने से
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