और तो हुआ ही क्या मुझ से
हुनर हुआ ज़ाया' मुझ से
शहर सदा देते थे पर
छूटा नहीं शिमला मुझ से
कुछ तो प्यास ही कम थी कुछ
दूर भी था दरिया मुझ से
वक़्त था वो भी आख़िर का
क्या ही हो पाता मुझ से
मैं तो मैं था आइना भी
हाल छुपाता था मुझ से
ठेस तो ऐसी लगा ज़ालिम
हो पाए रोना मुझ से
छोड़ गया ये बात भी छोड़
मिल कर तो जाता मुझ से
वो मेरा ही जंगल था
जिस का पेड़ कटा मुझ से
जीत में अब सर झुकता है
वो ऐसे हारा मुझ से
तन्हा हो पर कैसे हो
ये क्या पूछ लिया मुझ से
— Rajnishwar Chauhan 'Rajnish'















