जब कभी याद तिरी दिल में सिमट जाती है

इक उदासी मिरे चहरे से लिपट जाती है

ख़ुदा की रहमतों में से ये भी इक रहमत है
मैं चराग़ों को जलाऊँ हवा हट जाती है

ये गणित इश्क़ का हम को नहीं आया ता-उम्र
दो की संख्या भी यहाँ तीन से कट जाती है

बाँधकर रखता हूँ जब उस को मैं इस हुजरे में
वो मिरे जिस्म के हर हिस्से में बट जाती है

इन पहाड़ों से नदी को कोई तो मसअला है
मिल के इन से नदी की राह जो कट जाती है

जब भी मैं ने तुझे ख़ुद में से घटाना चाहा
जिस्म से मेरे तिरी ख़ुशबू लिपट जाती है

— Raj Tiwari

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