मुफ़्ती-ए-दीं कहाँ है कहाँ मुस्तफ़ा
दीन मुश्किल में हैं बच्चियाँ मुस्तफ़ा
तेज़-तर हर तरफ़ बस चले जा रही
रोकना ज़ुल्म की आँधियाँ मुस्तफ़ा
चंद काफ़िर लिए बैठे हैं सर-ज़मीं
बाग़ क़ब्ज़े में है बाग़बाँ मुस्तफ़ा
हाथ मज़हब का परचम लिए है फिरे
और कोई नहीं बद-गुमाँ मुस्तफ़ा
हम कभी सर कफ़न ले फिरा करते थे
पाँव में पड़ गई बेड़ियाँ मुस्तफ़ा
फ़र्ज़ अपना अदा कैसे मोमिन करे
रोज़ की ये ग़लत फ़हमियाँ मुस्तफ़ा
वक़्त ढलता गया और फिर एक दिन
आ गया आख़िरी इम्तिहाँ मुस्तफ़ा
— Raushan miyaa'n















