टूट के वो किधर गया होगा
काँच जैसे बिखर गया होगा
ख़ामुशी से यहाँ की ज़ाहिर है
कोई दीवाना मर गया होगा
याद बेटे को आ गई माँ की
फोन से पेट भर गया होगा
हम ने कुत्ते का पट्टा खोला यूँ
सोचा था वो सुधर गया होगा
भूल कासिम गली को फिर ग़ालिब
मदिरालय ठहर गया होगा
और मय-ख़्वार जाएगा किस पर
अपने ही बाप पर गया होगा
गुफ़्तगू बिन किए हमें उन से
एक अर्सा गुज़र गया होगा
छोड़ कैराना को भई 'रौशन'
राम जाने किधर गया होगा
— Raushan miyaa'n















