उल्फ़त न सही दिल को जलाने के लिए आ
आ फिर से मिरा नफ़्स मिटाने के लिए आ
तुझ से मुझे अब कोई शिकायत भी नहीं है
बस एक झलक अपनी दिखाने के लिए आ
मुद्दत से मिरी आँख में ठहरा हुआ सहरा
इस रेत को अब आब बनाने के लिए आ
दिल है मिरा वीरान चराग़ों को ख़बर दें
इक शम्अ यहाँ फिर से जलाने के लिए आ
हम ख़ाक-नशीं तुझ को भुला भी नहीं पाए
आ तू भी कभी ख़ाक उड़ाने के लिए आ
कब से मिरी साँसों में तेरा नाम है अटका
इक बार इसे लब पे सजाने के लिए आ
ये हिज्र की शब और भी तूलानी हुई है
तू चाँद सा चेहरा ये दिखाने के लिए आ
'रेहान' की आँखों में है अब तक तिरी सूरत
इक ख़्वाब को ताबीर दिलाने के लिए आ
— REHAN KHAN















