दर्द-ए-दिल है निहाँ ज़माने से
अश्क छुपते नहीं छुपाने से
अब नया और तुम ख़ुदा लाओ
ये सनम हो गए पुराने से
वक़्त पे छोड़ दो अभी देखो
और रूठेंगे वो मनाने से
लोग अक्सर उदास रहते हैं
क्या वफ़ा उठ गई ज़माने से
देखो ये मश्ग़ला नहीं अच्छा
बाज़ आ जाओ दिल दुखाने से
है अजब जुस्तजू का दरिया भी
मैं उभरता हूँ डूब जाने से
— RIZWAN ALI RIZWAN















