फ़ितरत से हम पंछी हैं
अरमानों के क़ैदी हैं
रौशन हैं चेहरों से पर
अंदर से सब ख़ाली हैं
सच्चाई है दिल में पर
बाहरस हम नक़ली हैं
अपना कोई मेल नहीं
आग हो तुम हम पानी हैं
ये दुनिया इक जंगल है
हम जंगल के वासी हैं
मंज़िल का तो इल्म नहीं
इतना पता है 'राही' हैं
— Rupesh Rahi















