ज़िंदगी जो लिख रही वो गीत गाने के लिए
अश्क आँखें पी गईं हैं मुस्कुराने के लिए
रूह छलनी है मगर चेहरे पे है झूठी हँसी
किस क़दर लाचार हैं हम ग़म छुपाने के लिए
नीचता की हद जो थीं वो तोड़ डाली हैं सभी
लोग कितना गिर गए हम को गिराने के लिए
एक दीया जल रहा इक कोठरी के वास्ते
सब हवाएँ चल पड़ीं उस को बुझाने के लिए
ठोकरें भी लाज़िमी हैं कुछ सफ़र के वास्ते
कुछ तो पत्थर चाहिए हैं लड़खड़ाने के लिए
खेलते हैं सब यहाँ बस जीतने के वास्ते
हौसला रखना मगर तुम हार जाने के लिए
रोज़गारी से ज़रूरी और भी मुद्दे हैं कुछ
धर्म अव्वल है मगर पागल बनाने के लिए
— Rupesh Rahi















