इक नज़र देख इन राएगाँ आँखों में
तू ही पढ़ पाएगी दास्ताँ आँखों में
तुम मुझे छोड़ कर तो नहीं जाओगी
सारा सच देख लो मेरी जाँ आँखों में
इतना रोती है वो छोटी सी बात पर
जैसे दस बीस हों आसमाँ आँखों में
उस ने चाहा ही था इस तरह से मुझे
आ गया था मिरे भी गुमाँ आँखों में
इतनी भी दूर मत जा दिखाई न दे
घर न कर लें कहीं दूरियाँ आँखों में
इस तरह से गया सब चमक ले गया
रह गईं सिर्फ़ खामोशियाँ आँखों में
ख़्वाब सब जल गए देखते देखते
रह गया बस धुआँ ही धुआँ आँखों में
ज़ख़्म तो भर गए वक़्त के साथ पर
आज भी दिखते हैं वो निशाँ आँखों में
इक हुनर आ नहीं पाया था उम्र भर
और आई नहीं इक ज़बाँ आँखों में
— Sagar Sahab Badayuni















