झगड़े से हुई जब भी शुरुआत हमारी
मुश्किल से गुज़रती थी ये फिर रात हमारी
हम को भी भुला देगा किसी रोज़ यक़ीनन
जिस ने भुला दी पल में मुलाक़ात हमारी
जब देखते ही देखते हो जाएगा सब ख़त्म
उस वक़्त समझ आएगी हर बात हमारी
जिस तख़्त पे बैठे हुए तुम फूल रहे हो
दर अस्ल थी वो दी हुई ख़ैरात हमारी
हर बात पे औक़ात पे जाने लगे हो तुम
बतलाई तुम्हें जाएगी औक़ात हमारी
— Sagar Sahab Badayuni















