झूठे नक़ाब जिन के उतरते चले गए

वो लोग मेरे दिल से उतरते चले गए

मैं दास्ताँ सुना रहा था आप को मगर
क्यूँ आप उस में इतने उतरते चले गए

कुछ ऐसे हादसे लिए हैं देख ज़िंदगी
आँखों से मेरे चश्में उतरते चले गए

होते हैं लोग आप के जैसे अगर सभी
अच्छा है सारे दिल से उतरते चले गए

जैसे कभी भी थे ही नहीं ज़िंदगी में रंग
चेहरे से मेरे ऐसे उतरते चले गए

चेहरे पे फिर हँसी नहीं आई मिरे कभी
कुछ ज़ख़्म इतने गहरे उतरते चले गए

— Sagar Sahab Badayuni

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