मैं ने चाहा ही नहीं भीड़ का रेला निकले
जब भी निकले मिरा चुप चाप जनाज़ा निकले
उस के बस दिल से निकलना है मुझे कैसे भी
कोई तरकीब बता जिस से वो रस्ता निकले
कर नहीं पा रहा हूँ तुझ पे यक़ीं चाह के भी
क्या पता तू भी उसी शख़्स के जैसा निकले
मैं तुम्हें दुनिया समझता था मिरी तुम लेकिन
सारी दुनिया की तरह झूट कि दुनिया निकले
कब तलक दिल में छुपाऊँगा सभी बातों को
अच्छा होगा कि मिरी आँख से दरिया निकले
इतनी भी अक़्ल नहीं है तुझे पागल लड़की
अच्छा दिखता हो ज़रूरी नहीं अच्छा निकले
— Sagar Sahab Badayuni















