tumhaari aankh men thehra hua hooñ | तुम्हारी  आँख  में  ठहरा  हुआ  हूँ

  - Sagheer Lucky

तुम्हारी  आँख  में  ठहरा  हुआ  हूँ
कभी  आँसू  कभी  सपना हुआ हूँ

मैं किसके  हाथ की  ज़ीनत बनूँगा
हिनाई   शाख़   से   टूटा   हुआ  हूँ

तेरे दिल  में जगह अपनी बना ली
मैं  ख़ुश्बू  की  तरह  फैला हुआ हूँँ

समेटे  आ  के   माला  ही  बना  ले
मैं बासी  फूल सा  बिखरा  हुआ हूँ

कोई  सिलवट  नहीं है  बिस्तरों पर
कई  रातों  का  मैं  जागा  हुआ  हूँ

मुहब्बत की  कशिश  भारी पड़ी है
तुम्हारे   शह्र   में   आया   हुआ  हूँ

यहाँ   कोई  नहीं  होता  किसी  का
ख़ुशी  तंगी से  भी  गुज़रा  हुआ हूँ

नहीं कुछ  होश  बाक़ी है  ज़रा  भी
मुहब्बत  में   दिवानों  सा  हुआ  हूँ

अबस  बच्चा समझते हैं अभी तक
मैं हर  इक  दौर से  गुज़रा  हुआ हूँ

जिसे वालिद की शफक़त मानते हो
मैं  उसकी  छाँव  में  बैठा  हुआ  हूँ

अभी फुर्सत नहीं  है कुछ लकी जी
बहुत  से  काम  में उलझा  हुआ हूँ

  - Sagheer Lucky

Rose Shayari

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