labo rukhsaar pe paighaam kyun hai | लबो रुख़्सार पे पैग़ाम क्यूँ है

  - Sagheer Lucky

लबो रुख़्सार पे पैग़ाम क्यूँ है
ये ज़िक्रे यार सुब्हो शाम क्यूँ है

भरोसा रब पे है ये बात समझो
हज़ारों ग़म में भी आराम क्यूँ है

तुम्हें तो बारहा समझा चुका हूँ
अभी भी ज़ह्न में ईहाम क्यूँ है

जहाँ रोटी नहीं खाने को इक भी
वहाँ मँहगी दवा का दाम क्यूँ है

है कोई ज़ब्त का यह इम्तिहाँ क्या
मेरे हाथों में ख़ाली जाम क्यूँ है

मिटेगी अब ग़रीबी सब घरों से
सरे महफ़िल ये चर्चा आम क्यूँ है

ज़माना मुझ से ही क्यूँ पूछता है
मेरे होठों पे उसका नाम क्यूँ है

लकी ने की अकेले ही मुहब्बत
हमारा नाम ही बदनाम क्यूँ है

  - Sagheer Lucky

Udasi Shayari

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